छत्रपति शिवाजी

मूल लेखक

लाला लाजपतराय

सम्पादक तथा भाषा-परिष्कारक

डाॅ. भवानीलाल भारतीय

विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द




सम्पादकीय

लाला लाजपतराय अपने युग के महान देशभक्त, राष्ट्रनेता तथा स्वतन्त्रता सेनानी तो थे ही, वे एक सिद्वहस्त लेखक तथा साहित्यकार भी थे। उर्दू और अंगे्रजी उनकी विचाराभिव्यक्ति की प्रमुख भाषाएं थीं। वे पंजाब में जन्में और वहीं उनका प्रमुख कार्यक्षेत्र रहा। इस प्रान्त में उर्दू का प्रचलन मुसलमानी शासन से लेकर अंग्रेजी हकूमत तक रहा। लालाजी ने अपने प्रमुख ग्रन्थ उर्दू में लिखे हैं। कालान्तर में जब वे राजनीति के क्षेत्र में आये तो उन्हें अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए अंग्रेजी का सहारा लेना पड़ा। वकालत जैसे व्यस्त व्यवसाय में आकण्ठ मग्न रहने पर भी लालाजी अध्ययन के लिए पर्याप्त समय निकाल लेते थे। महापुरूषों के जीवनचरितों को पढ़ना तथा उन पर मनन करना


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जागीर का (5 लाख पगोड़ा प्रति वर्ष) प्राप्त हो इन अधिकारों के बदले 3 लाख वार्षिक की किस्त से 40 लाख ’पगोड़ा’ की भेंट शाही कोष में देने की प्रतिज्ञा की गई।

राजा जयसिंह ने इन शर्तो को पूरा करने के लिए अपने ऊपर भार लिया। औरंगजेब ने इसके उत्तर में जो पत्र लिखा था उसमें उसने भी शर्ते स्वीकार की थी। ’देशमुखी’ अधिकार जो चैथी शर्त में था औरंगजेब ने उसका कहीं जिकर भी नहीं किया था। हां, पहली शर्त अवश्य मान ली थी। इनके सिवाय औरंगजेब ने एक शर्त और बढ़ा दी थी कि ’शिवाजी’ के बीजापुर को सर करने में सहायता दंे।


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