कि वह तो थोड़ी सी सेना के साथ आया है, बड़ी सेना साथ लेकर तो खुद बादशाह जलालुद्दीन खिलजी आ रहा है। यह समाचार सुन कर राजा रामदेव राय ने सन्धि करने में ही अपनी भलाई समझी। इधर तो सन्धि की चर्चा चल रही थी, उधर राजा रामदेव राय का पुत्र यात्रा से लौट आया और अपनी सेना के साथ खिलजी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उसने अलाउद्दीन खिलजी को सामने आकर लड़ने की चुनौती दी। इस अवसर पर खिलजी ने चालाकी से काम लिया । वह अपनी सेना का एक बड़ा हिस्सा लेकर युवराज के सामने आ डटा और कुछ सैनिकों को किले की रक्षा के लिए छोड़ दिया ताकि समय आने पर वह भी सहायता के लिए आ सकें तथा राजा के सैनिकों को यह धोखा हो जाये कि बादशाह जलालुद्दीन की सेना भी आ गई है। अलाउद्दीन की यह चालाकी सफल रही। राजकुमार ने वीरता से युद्व किया किन्तु जब उसने देखा की पराजय सन्निकट
रहेंगे। भारत में ऐसा कौन हिन्दू है जो टाॅड साहब द्वारा लिखे गये राजस्थान के इतिहास को पढ़कर उनका कृतज्ञ नहीं होगा। यदि इस देश के राजा अपने पूर्वजों की वीरता की कहानियां पढ़ने का अवसर मिलेगा।
भारत के दक्षिण में एक और जाति है जो सदा अध्ययन में लीन रही और जिसके पास अपनी जाति का इतिहास कई खण्डों में मौजुद है। यह मराठा जाति है। मेरा विश्वास है कि इस प्रकार का इतिहास भारत के अनेक प्रान्तों की हिन्दू जातियों के पास भी है जिससे उन्हें अपनी अवनति के कारणों का