है तो उसे एक और विपत्ति का सामना करना पड़ा। उसी समय किले में रूकी खिलजी सेना वहां आ गई। हिन्दू सेना ने समझाा कि यह बादशाह जलालुद्दीन की सेना है। अब उसके पांव उखड़ गये, उसके सिपाई युद्व क्षेत्र से भाग गये और मुसलमानों की विजय हुई। दुर्भाग्य इसे की कहें

विज्ञप्ति 19

कि रसद की सामग्री में जिन्हें आटे के बोरे समझा गया था वे वस्तुतः नमक के बोरे थे। अब राजा रामदेव राय ने पर्याप्त धन तथा राज्य का कुछ इलाका अलाउद्दीन को सौंपने में ही अपनी भलाई समझी और सन्घि कर ली।

इसके बाद अलाउद्दीन के शासन काल में उसके सेनापति मलिक काफूर ने तीन बार दक्षिण पर चढ़ाई की, लूटमार की किन्तु जब दिल्ली का सिंहासन खुद मुसीबतों में फंस गया तो दक्षिण के हिन्दू राजा एक बार पुनः स्वतन्त्र हो गये। अकेला देवगढ़ मुसलमानों के अधीन रहा। इस समय दक्षिण में हिन्दू शक्ति प्रबल हो गई,


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बोध होता है। यदि सब को एकत्र किया जाये तो हमारी इस विशाल जाति की गिरावट का इतिहास जानने का पर्याप्त मसाला मिल जायेगा। प्रायः देखा जाता है कि जिसके जी में जो आता है वह हिन्दुओं को डरपोक व कायर कहने में कोई संकोच नहीं करता। अंगे्रज या मुसलमान ऐसा कहें तो उसका कुछ कारण हो सकता है किन्तू आश्चर्य इस बात का है कि खुद हिन्दू जाति को अपनी भीरूता का कुछ ऐसा ही विश्वास हो गया है कि वह इससे भिन्न कुछ मानने को तैयार ही नहीं। सबसे पहले तो हमारे मदरसों में मुल्लाओं


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