कुछ विदेशी लेखकों के ग्रन्थ इस विषय पर उपलब्ध थे।शायद मराठी में कुछ सामग्री रही होगी। लालाजी ने सभी उपलब्ध सूत्रों को समन्वित कर छत्रपति शिवाजी शीर्षक यह जीवनी लिखी। इसके पश्चात् ही बंगाली इतिहासकार सर यदुनाथ सरकार द्वारा लिखित शिवाजी का प्रामाणिक इतिवृत्त प्रकाश में आया किन्तू लालाजी इन नवीनतम शोध-सामग्री का लाभ नहीं ले सके थे।

शिवाजी महाराज के जीवनवृत्त को प्रस्तुत करने से पहले लालाजी ने ’विज्ञप्ति’ शीर्षक से इस ग्रन्थ की एक विस्तृत भूमिका लिखी। इसमें उन्होंने भारतीय इतिहास का सिंहावलोकन करते हुए हिन्दू राष्ट्र, धर्म एवं समाज के पतन के विभिन्न कारणों की समीक्षा की। साथ ही यह भी बताया कि मुसलमानी शासकों द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों का प्रतिरोध करने के लिए पंजाब में सिख, राजपुताना में महाराणा प्रताप और दुर्गादास तथा दक्षिण भारत में मराठा शक्ति का किस प्रकार उदय हुआ और इन


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था। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में उनकी महापुरूषों के विशद जीवनचरित लिखे। योगिराज कृष्ण, छत्रपति शिवाजी, सम्राट् अशोक, महर्षि दयानन्द तथा अपने सहपाठी एंव वैदिक विद्वान पं. गुरूदत्त विद्यार्थी के प्रामाणिक जीवनचरित लिखने के साथ साथ उन्होंने इटली को स्वाधीनता दिलाने वाले ग्वीसेप मैजिनी तथा वीर गैरीवाल्डी के जीवनचरित भी लिखे। इन दो विदेशी महापुरूषों ने लालाजी को अत्याधिक प्रभावित किया था।

जिस समय वे मराठा वीर छत्रपति शिवाजी का जीवनचरित लिख रहे थे उस समय तक इस महापुरूष के बारे में अधिक गहरा ऐतिहासिक अनुसंधान नहीं हुआ था। खाफी


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