सब ने मिल कर देवगढ़ कि किले को घेर लिया। उस समय बादशाह खुद सेना लेकर लड़ाई में उतरा। दीनराव नाम के किसी हिन्दू राजा को मुसलमानों ने पकड़ लिया और उसे जिन्दा दीवार में चुनवा दिया। मुसलमानों की नृशंसता का यह एक जीता जागता उदाहरण था। इसके बाद 1323 तक दक्षिण में शान्ति रही। कुछ दिन बाद बादशाह मुहम्मद तुग़लक ने सेना सहित दक्षिण पर चढ़ाई की । चारों ओर लूटपाट का दौर शुरू हुआ। हिन्दू राजधानी तेलंगाना उजाड़ दिया गया। हिन्दू प्रजा ने मुसलमानों की अधीनता में रहने की अपेक्षा देश निर्वासन को स्वीकार किया। दस वर्ष बाद तेलंग देश के इन लोगों ने एक नगर बसाया जिसका नाम विजयनगर रखा गया। धीरे धीरे यह नगर इस देश की राजधानी के रूप में बढ़ चला।पर्याप्त काल तक विजयनगर राज्य स्वतन्त्र रहा किन्तु 1864 में उस क्षेत्र के मुसलमान बादशाहों ने मिल कर उस पर


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ने, इसके बाद स्कूलों के मास्टरों ने और फिर आगे कालेजों में अंगे्रजी ने हमें यही पढ़ाया कि हमारी जाति की कायरता का कारण हमारे दार्शनिक विचार हैं। किन्तू सूक्ष्मदर्शिता और कायरता को

14 छत्रपति शिवाजी

पर्याय नहीं कहा जा सकता । यदि अंगे्रज जाति में हक्सले और डारविन जैसे दार्शनिकों के होने पर भी वीरता आ सकती है तथा अफलातून प्लेटो अरस्तु, हेगल, शिलर, गेटे, मिल्टन तथा शाॅपनहार जैसे दार्शनिकों और कवियों को उत्पन्न करने वाली जातियों में भी वीर हो सकते हैं तो कोई कारण नहीं


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