हमला कर किया और तालीकोट की प्रसिद्व लड़ाई में विजयनगर के विख्यात हिन्दू राज्य को नष्ट कर दिया। इस समय तक कर्नाटक तथा पश्चिमी प्रदेश पूर्ण स्वाधीन थे केवल दक्षिण प्रान्त का उत्तरी भाग ही मुसलमानों के अधिकार में था।
सम्राट अकबर के सिंहासन पर बैठने के समय से लेकर सत्रहवीं शताब्दी लगभग 150 वर्ष तक मुसलमानी
20 छत्रपति शिवाजी
साम्राज्य उन्नति करता रहा। अकबर ही पहला मुसलमान बादशाह था जिसने समस्त भारत को एक साम्राज्य के अधीन करने का विचार किया। उसने ठीक सोचा था कि हिन्दुओं के सहयोग के बिना यह कार्य सम्भव नहीं हैं। अकबर ने अपनी चालाकी से हिन्दुओं को इस प्रकार वश में किया जो उनकी गुलामी का ही पर्याय कहा जा सकता है। पराजित हिन्दू अकबर की कूटनीति के वश में होकर स्वयं को सन्तुष्ट समझने लगे। यह तो अकबर की चतुराई का ही नतीजा था कि करोड़ों हिन्दू
कि दार्शनिकों को उत्पन्न करने वाली हिन्दू जाति में वीर न हुए हों। ईसा की इस शिक्षा के रहने पर भी कि ’’कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा भी उसके सामने कर दो।’’
ईसाई जातियां बहादुर रह सकती है और मुसलमान लोग सूफियों के अद्वैतवाद की शिक्षा का प्रचार करते हुए भी वीर और उत्साही रह सकते है तो कोई कारण नहीं कि हिन्दू अपने विज्ञान और दर्शन के कारण अपनी वीरता खो बैठें। यह कहना तो केवल हेत्वाभास है। ऊपर जो कुछ कहा गया वह विपक्षियों के आधार