यह हुआ कि हिन्दुओं ने औरंगजेब को चैन से नहीं बैठने दिया। इस समय हिन्दू जाति में फिर परिवर्तन आया। औरंगजेब के पतन से लेकर 1847 के विद्रोह तक मुगलवंश का इतिहास हिन्दुओं की राजनैतिक उन्नति और योरोपियन शक्तियों के ताकत पकड़ने का इतिहास है। भारत के पश्चिमी भाग में भी ऐसी ही परिस्थितियां पैदा हो रही थीं। हम लिख चुके हैं कि 13 वीं शताब्दी के अन्त में मुसलमानों ने विन्ध्याचल के पश्चिम में पैर बढ़ाया था। मोहम्मद तुगलक के मन में यह विचार आया कि दिल्ली के स्थान पर दक्षिण में देवगढ़ को दौलताबाद बाग नाम देकर नई राजधानी बनाई जाये। इस बादशाह के समय में बहुत से आन्तरिक विद्रोह हुए। खुद मुसलमान अफसर भी बागी हो गये, यहां तक कि दक्षिण के सभी हिन्दू मुसलमानों ने एक षड्यत्र रच कर उस की राजधानी दौलताबाद पर अधिकार कर लिया। इन विद्रोहियों ने जाफर खां नामक एक
की अवनति के काल में भी उनकी धार्मिकता, पवित्रता तथा वीरता के अनेक प्रमाण मिलते हैं। यह तो सत्य है िकइस जाति में समय समय पर अनेक कायर, देशद्रोही, अधर्मी तथा विश्वासघातक भी उत्पन्न हुए, जिन्होंने नितान्त स्वार्थवश अपने धर्म और जाति को दुश्मनों के हाथ बेच डाला किन्तू ऐसे विषम काल में भी, मुसलमानों की अधीनता के काल में भी अनेक शूरवीरों को उत्पन्न कर यदि यह हिन्दू जाति अपने धर्म पर स्थिर रह सकी तो संसार में इसका उदाहरण अन्यत्र कहां मिलेगा? क्या कोई जाति इस्लाम के