ने अपना यह काम जारी रखा। मुसलमान अधिकारियों ने गुरूमत को फैलता हुआ देखा तो उन्होंने हिन्दुओं को सताना शुरू कर दिया। जब सिखों ने देखा कि अब मात्र ईश्वरभक्ति ही पर्याप्त नहीं है तो गुरूओं ने धर्म रक्षा के लिए तलवार उठाई। सिखों को वीर जाति के रूप मेें विकसित होता देख कर मुसलमान बौखलाये और उन्होंने सिखों पर सीमातीत अत्याचार करने शुरू किये। यहां तक कि सिखों पर सीमातीत अत्याचार करने शुरू किये। यहां तक कि सिख गुरूओं का भी वध कर दिया गया। किन्तू असन्तोष की जो चिन्गारी सुलगी वह अब बुझने वाली नहीं थी। गुरू अर्जुन ने विपत्तियां झेली किन्तु धर्म नहीं छोड़ा। मतीसिंह तथा अन्य अनके सिखों ने धर्म के लिए दुःख सहे।
24 छत्रपति शिवाजी
गुरू तेगबहादुर के बलिदान ने इस चिनगारी को आग का रूप दे दिया। उनके प्रिय पुत्रों ने अपने पिता के जीवन समर्पण से शिक्षा लेकर धर्म के लिए सर्वस्व बलिदान
कुतबुद्दीन एबक था जो गुलाम वंश का था, जिस का कार्यकाल 1205 या 1206 ई. माना जा सकता है।
बारहवीं से सोलहवीं शताब्दी, अथवा यों कहें कि सम्राट् अकबर के शासन काल तक इस देश में अनेक स्वतन्त्र हिन्दू नरेश थे। भारत के मानचित्र पर हम दृष्टिपात करें तो इसमें आपको राजपुताना का विशाल क्षेत्र दिखाई देगा। मूलतः यह उतना छोटा नहीं था जितना आज है। वस्तुतः एस समय का यह राजस्थान बहुत बड़ा था। 1395 में दिल्ली के सिंहासन पर बैठने वाला अलाउद्दीन खिलजी प्रथम व्यक्ति