प्रबल शक्तियों ने किस प्रकार दुर्दमनीय इस्लामी मतान्ध शासकों के प्रहार का मुकाबला किया। इस विज्ञप्ति से लालाजी का व्यापक इतिहास परिशीलन तथा विचरण विवेचन-क्षमता का पता चलता है।
लालाजी के द्वारा लिखे गये ये जीवनचरित हमारे अनुमान से उन्नीसवीं शताब्दी की समाप्ति के पहले ही लिखे जा चुके थे। राष्ट्र नेता की भव्य छवि को धारण करने वाले लालाजी का पाठक वर्ग देशव्यापी रहा होगा, यह तो सत्य ही है। अतः उनके लिखे जीवनचरितों का तत्काल हिन्दी अनुवाद हुआ और पाठकों को ये जीवनियां सुलभ हो गई। तथापि यह ध्यान रखना होगा कि आज से सौ वर्ष पहले का हिन्दी गद्य न तो परिष्कृत था और न गद्य लेखन में एकरूपता आ पाई थी। शब्दों के रूप् अभी स्थिर नहीं हुए थे और वाक्य-रचना भी प्रायः अटपटी रहती थी। छत्रपति शिवाजी के प्रस्तुत हिन्दी
6 छत्रपति शिवाजी
अनुवाद की भी यही स्थिति थी, किन्तू आज के पाठकों के
सम्पादकीय 5
खां जैसे एकाध मुसलमान इतिहासकार द्वारा लिखे गये वृत्तान्त के अतिरिक्त कुछ विदेशी लेखकों के ग्रन्थ इस विषय पर उपलब्ध थे।शायद मराठी में कुछ सामग्री रही होगी। लालाजी ने सभी उपलब्ध सूत्रों को समन्वित कर छत्रपति शिवाजी शीर्षक यह जीवनी लिखी। इसके पश्चात् ही बंगाली इतिहासकार सर यदुनाथ सरकार द्वारा लिखित शिवाजी का प्रामाणिक इतिवृत्त प्रकाश में आया किन्तू लालाजी इन नवीनतम शोध-सामग्री का लाभ नहीं ले सके थे।
शिवाजी महाराज के जीवनवृत्त को प्रस्तुत करने से पहले