करने की प्रतिज्ञा की । जिस धर्मयज्ञ में गुरू तेग बहादुर ने स्वयं की बलि दी थी, उसमें उनके पुत्र गुरू गोविन्द सिंह ने अपने चारों पुत्रों की आहुति दे दी। दशम गुरू गोविन्द सिंह ने एक हाथ में भक्ति का प्याला उठाया तो दूसरे हाथ में जाति रक्षा के लिए तलवार धारण की । संसार ने गुरू जी की भक्ति और शक्ति के जलवे को देखा।
पंजाब में सिख धर्म जो काम कर रहा था, वही दक्षिण में महाराष्ट्र में हो रहा था। महाराष्ट्र की यह धती स्वामी दयानन्द की जन्मभूमि गुजरात से अधिक दूर नहीं है। पंजाब में धर्मसुधार का जो कार्य गुरू नानक ने किया वही काम महाराष्ट्र के तुकाराम, एकनाथ, नामदेव, ज्ञानेश्वर आदि सन्तों ने किया। छूतछात के भूत को भगा कर इन सन्तों ने सच्ची ईश्वरभक्ति का पाठ पढ़ाया। गुरू गोविन्द सिंह ने तो अपने धर्मात्मा पिता के शव को छूकर शपथ ली थी कि जिन लोगों ने मेरे पिता को मारा है, उनसे मैं बदला
था जिसने राजपुताना पर चढ़ाई की 14 वीं शताब्दी के आरम्भ में उसने चित्तौड़ पर चढ़ाई की किन्तू कुछ समय बाद यह प्रदेश पुनः स्वतंत्र हो गया। उसके बाद इस पर हमलाा करने वाला बादशाह अकबर था। अकबर का युद्व में मुकाबला करने में महाराणा प्रताप ने जो वीरता, धीरता तथा गम्भीरता दिखाई वह संसार के सामने प्रत्यक्ष है। महाराणा प्रताप को जैसी पराजय मिली वैसी परमात्मा किसी को न दे। आज
विज्ञप्ति 17
कौन ऐसा हिन्दू है जो राणा प्रताप पर गर्व न करता हो? महाराणा सांगा का