अवश्य लूंगा। केवल बदला ही नहीं लूंगा किन्तु इस पवित्र भारत भूमि से अत्याचारियों को समूल नष्ट कर दूंगा। अपने पूर्वजों के धर्म की रक्षा करने के लिए सर्वस्व अर्पित कर दूंगा।

गुरू जी के इन विचारों ने लोगों में देश और जाति सेवा का भाव भरे। ज्यों ही मुगल सेना ने दक्षिण की मुसलमान सल्तनतों का खात्मा करना शुरू किया और औरंगजेब ने मजहबी कट्टरता का नग्न रूप दिखाया, हिन्दुओं को विश्वास हो गया कि अब हमारे धार्मिक अधिकार बच नहीं पायेंगे। नाना प्रकार से हिन्दुओं का धर्म भ्रष्ट किया जाने लगा और उनके दमन में कोई कसर नहीं रखी गई। तत्कालीन हिन्दी कवियों ने ईश्वर भक्ति के काव्य की रचना कर समाज में व्याप्त अधर्म, अत्याचार तथा हिन्दुओं के दमन का सजीव

विज्ञप्ति 25

चित्र अंकित किया है। इस काव्य ने भी अधोगति प्राप्त लोगों को धर्म रक्षा के लिए आने की प्रेरणा दी। शिवाजी महाराज के प्रयत्न भी इसी दिशा


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दुर्भाग्य था कि अपने ही एक सेनापति के कपटाचरण के कारण उन्हें पराजित होना पड़ा। अन्यथा मुसलमानी राज्य की इतिश्री तो तभी हो गई होती। दैवी विधान में किसी का वश नहीं चलता। यह सत्य है कि महाराणा सांगा की पराजय ने दिल्ली के हिन्दू धर्म में कुछ ऐसे परिवर्तन किये जिनके फलस्वरूप कालान्तर में गुरू गोविन्दसिंह और उनके अनुयायियों जैसे वीर पुरूष भारत में पैदा हुए। राजपुतों ने भी अकबर से पहले तक के काल में पूर्णतया राजनैतिक परतन्त्रता स्वीकार नहीं की थी। अकेला राजपूताना ही भारत


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