में थे। जब हिन्दुओं ने देखा कि हमारी भक्ति और उपासना की स्वतन्त्रता भी मुसलमानों द्वारा बाधित की जाती है तो उनमें स्वधर्म रक्षा का जो जोश उमड़ा उसके आगे मुगल सेना और शाही तलवार भी कांप गई।

शिवाजी और गुरू गोविन्द सिंह पर लिखते समय यदि हम महाराणा प्रताप को भुला दे ंतो यह अन्याय होगा। मुगलवंश को मजा चखाने में वीर प्रताप तथा उनके वंशजों ने जो किया, उसे भुलाना कठिन है। महाराणा सांगा के राजसिंहासन पर जब प्रताप विराजमान हुए, उस समय मुगलों के अत्याचार सीमातीत स्थिति तक पहुंच गये थे। अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहने वाले महाराणा ने अपने प्यारे बच्चों को भूख से तड़पते और बिलबिलाते देखा तथापि उनके मन में मुगलों की अधीनता स्वीकार करने का विचार एक बार भी नहीं आया। उस समय के राजपुतों में फूट और विरोध पराकाष्ठा पर पहंुच चुका था। खुद महाराणा का भाई शक्तिसिंह अकबर


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का इतना विशाल प्रचण्ड था जिसने मुसलमानी शासन सिंहासन पर मुग़लों के शासन की स्थापना कर दी।

इधर तो दिल्ली का शासन मुगलों के अधिकार में था, उधर पंजाब में एक ऐसे देशभक्त ने जन्म लिया जिसने धर्मप्रचारकों और उपदेशकों के एक ऐसे दल को संगठित किया जिसने मुगल सत्ता का समूल नाश करने का बीड़ा उठाया। जिस समय बाबर ने दिल्ली में मुगल सल्तनत की नींव डाली, उसी समय गुरूनानक ने के बद्वमूल हो जाने के तीन सौ-चार सौ वर्षो बाद तक अपनी आजादी को बरकरार रखा।


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