के दरबार में एक पद स्वीकार कर चुका था और बादशाह का पक्ष लेकर महाराणा के विरूद्व तलवार उठा चुका था।
चित्तौड़ का किलाा मुगलों के अधीन था किन्तू अवशिष्ट राजपुताना पूर्ण स्वतन्त्र था। महाराणा प्रताप के बाद उदयपुर की राजगद्दी पर बैठने वाले किसी शासक के मन में प्रताप जैसी देशभक्ति की भावना नहीं जगी। यद्यपि मेवाड़ ने न तो अन्य राजपुत राजाओं की भांति मुगलों को अपनी बहिन बेटियां दीं और न उनकी अधीनता स्वीकार की तथापि यह राज्य भी अपनी स्वतन्त्रता को स्थिर नहीं रख सका। यहां राजनैतिक परिर्वतन का दौर चलता रहता था। राजपुतों के इतिहास में वीर दुर्गादास का नाम आता है जिसने अपने बल और पराक्रम का
26 छत्रपति शिवाजी
परिचय देकर औरंगजेब के गर्व को नष्ट किया था। दुर्गादास जोधपुर के राठौर वंश के सपूत थे। जोधपुर के महाराजा जसवन्तसिंह की काबुल में मृत्यु के पश्चात् जब औरंगजेब
चार सौ वर्ग मील क्षेत्र वाला उड़ीसा प्रान्त चैदहवीं शताब्दी के अन्त तक स्वतन्त्र रहा। दक्षिण में पश्चिमी घाट का प्रदेश भी स्वतंत्र रहा। 13 वीं शताब्दी में अलाउद्दीन खिलजी ने सर्वप्रथम दक्षिण पर चढ़ाई की। नर्मदा को पार कर खानदेश होता हुआ देवगढ़ तक बढ़ जाने वाला यही पहला मुसलमान हमलावर था। उस समय इसका चाचा ज़लालुद्दीन खिलजी दिल्ली के सिंहासन पर था। अलाउद्दीन ने यों तो यह प्रसिद्व कर रखा था िकवह अपने चाचा के व्यवहार से क्रुद और रूष्ट होकर दक्षिण की ओर जा रहा था, वस्तुतः उसकी इच्छा दक्षिण विजय करने की थी।