से दूर रहते हैं किन्तू राजपूताना के अनेक अग्रवालों ने अपने राज्य की दीवानगीरी तथा खजाने को संभालने के काम को त्याग कर अपने हाथों में तलवार उठाई थी। वे राजपूत सरदारों के साथ युद्वों में लड़े भी थे। महाराष्ट्र के ब्राह्यणों में वीरता आज तक पाई जाती है। क्षत्रिय ही वैश्यों का व्यवसाय धारण कर ’खत्री’ बन गये । इन खत्रियों ने महाराजा रणजीतसिंह के समय में जो वीरता दिखाई उसे लोग अभी तक नहीं भूले हैं। सीमान्त प्रदेश के अफगान इन खत्रियों की वीरता से पराजित हैं। हमारे लिखने का अभिप्राय इतना ही है कि मुसलमानी शासनकाल में कोई वक्त ऐसा नहीं था, जब हिन्दुओं में वीरता, धैर्य, बल और पराक्रम की कमी रही हो। यदि हिन्दुओं में वीरता और साथ ही कष्ट सहिष्णुता नहीं होती तो आज भारत में बीस करोड़ हिन्दु नहीं पाये जाते। अब तो अंग्रेजी सेना में भी आधे सिपाही हिन्दुस्तानी हैं। इन फौजों में गोरखा और सिखों
खिलजी को सामने आकर लड़ने की चुनौती दी। इस अवसर पर खिलजी ने चालाकी से काम लिया । वह अपनी सेना का एक बड़ा हिस्सा लेकर युवराज के सामने आ डटा और कुछ सैनिकों को किले की रक्षा के लिए छोड़ दिया ताकि समय आने पर वह भी सहायता के लिए आ सकें तथा राजा के सैनिकों को यह धोखा हो जाये कि बादशाह जलालुद्दीन की सेना भी आ गई है। अलाउद्दीन की यह चालाकी सफल रही। राजकुमार ने वीरता से युद्व किया किन्तु जब उसने देखा की पराजय सन्निकट है तो उसे एक और विपत्ति