28 छत्रपति शिवाजी
लिए भी शारीरिक बल की आवश्यकता रहती है।
यदि कोई बलवान् चोर या डाकू हमारी उपार्जित सम्पत्ति को छीन ले और हम अपनी बौद्विक उपाधियों की दुहाई देते रहें तो हमारी नादानी होगी। आगे के पृष्ठों में हम शारीरिक शक्ति, बल, पराक्रम और साहस का एक ऐसा उदाहरण पेश करेंगे जिसने स्वधर्म की रक्षा तथा अपने वंश की उन्नति के लिए कैसा पुरूषार्थ किया था। शिवाजी का जन्म ऐसे युग में हुआ था जब भारत से विद्या और धर्मप्रेम प्रायः समाप्त हो चुका था और परिवार के सदस्यों का पारस्परिक विश्वास और प्रेम लुप्त हो रहा था। किसी का धर्म या धन सुरक्षित नहीं था। सचमुच वह समय बड़ा विकट था जबकि हिन्दू और मुसलमान दोनों के लिए युद्व का भय उपस्थित रहता था। उस समय खून की नदियां बह रही थीं। बडे़ बडे़ शहर विनाश के कगार पर खडे़ थे। धनी पल भर में कंगाल हो जाते
अलाउद्दीन के शासन काल में उसके सेनापति मलिक काफूर ने तीन बार दक्षिण पर चढ़ाई की, लूटमार की किन्तु जब दिल्ली का सिंहासन खुद मुसीबतों में फंस गया तो दक्षिण के हिन्दू राजा एक बार पुनः स्वतन्त्र हो गये। अकेला देवगढ़ मुसलमानों के अधीन रहा। इस समय दक्षिण में हिन्दू शक्ति प्रबल हो गई, सब ने मिल कर देवगढ़ कि किले को घेर लिया। उस समय बादशाह खुद सेना लेकर लड़ाई में उतरा। दीनराव नाम के किसी हिन्दू राजा को मुसलमानों ने पकड़ लिया और उसे जिन्दा दीवार में चुनवा