और दरिद्रों को धनी बनाने में भी देर नहीं लगती थी। न मन्दिर सुरक्षित थे और न मस्जिदें।
ऐसी भीषण स्थिति में जन्म लेकर शिवाजी ने अपने सघन धर्मपे्रम का परिचय दिया और नारियों के सतीत्व की रक्षा की। न केवल अपना ही आचरण शुद्व रखा अपितु किसी भी व्यक्ति को नारी का अपमान करने पर घोर दण्ड दिया। गरीब किसानों की रक्षा की और उनके प्रति सद् व्यवहार किया । उसने ब्राह्यणों की रक्षा की और उनके प्रति सद् व्यवहार किया। उसने ब्राह्यणों की रक्षा की किन्तु परमत का खण्डन भी नहीं किया । यह महापुरूष औरंगजेब के काल का महान् वीर था। एक पक्षपाती मुसलमान इतिहासकार खाफी खां ने शिवाजी को ’काफिर’ कहा और उनकी मृत्यु पर लिखा कि वह नरक में गया तथापि उसने शिवाजी के सदाचार की प्रशंसा ही की है।
इस पुस्तक में शिवाजी का जो जीवनचरित लिखा गया है उसे पढ़ कर पाठकों को निश्चय हो जायेगा कि शिवाजी सचमुच महापुरूष थे। उनमें जैसी प्रबन्ध क्षमता थी वह अन्यत्र
दिया। मुसलमानों की नृशंसता का यह एक जीता जागता उदाहरण था। इसके बाद 1323 तक दक्षिण में शान्ति रही। कुछ दिन बाद बादशाह मुहम्मद तुग़लक ने सेना सहित दक्षिण पर चढ़ाई की । चारों ओर लूटपाट का दौर शुरू हुआ। हिन्दू राजधानी तेलंगाना उजाड़ दिया गया। हिन्दू प्रजा ने मुसलमानों की अधीनता में रहने की अपेक्षा देश निर्वासन को स्वीकार किया। दस वर्ष बाद तेलंग देश के इन लोगों ने एक नगर बसाया जिसका नाम विजयनगर रखा गया। धीरे धीरे यह नगर इस देश की राजधानी के