विज्ञप्ति 29
दुलर्भ थी। वे संगठन का महत्त्व तथा संगठन के सिद्वांतों को भली भांति जानते थे। यदि वे आज के युग में होते तो बड़े से बड़े यूरोपीय विद्वानों और सेनापतियों को कुछ शिक्षा दे जाते। वे युद्व-विद्या के निपुण पण्डित थे। शत्रुओं को परास्त करने की तरकीबें उन्हें मालूम थी। वे परम धीर, वीर ओर गम्भीर थे। वीरता और पराक्रम में वे अद्वितीय थे। बादशाह औरंगजेब के एक मंत्री से जब किसी बात पर क्रोधित हुए तो उनमें आत्मविश्वास और निर्भिकता पराकष्ठा की थी। धर्म पर उनका विश्वास उस कोटि का था जिसके कारण औरंगजेब को उनसे मुंह की खानी पड़ी। वे वीरों के प्रशंसक थे तथा सदाचार में अद्वितीय थे। उनका आचरण शुद्व एंव पवित्र था, यही कारण है कि इस महापुरूष की जीवन कथा हम अपने देश के युवकों को सुनाना चाहते हैं। हमें विश्वास है कि इस जीवनचरित को पढ़ कर हमारे युवक भी सदाचारी
रूप में बढ़ चला।पर्याप्त काल तक विजयनगर राज्य स्वतन्त्र रहा किन्तु 1864 में उस क्षेत्र के मुसलमान बादशाहों ने मिल कर उस पर हमला कर किया और तालीकोट की प्रसिद्व लड़ाई में विजयनगर के विख्यात हिन्दू राज्य को नष्ट कर दिया। इस समय तक कर्नाटक तथा पश्चिमी प्रदेश पूर्ण स्वाधीन थे केवल दक्षिण प्रान्त का उत्तरी भाग ही मुसलमानों के अधिकार में था।
सम्राट अकबर के सिंहासन पर बैठने के समय से लेकर सत्रहवीं शताब्दी लगभग 150 वर्ष तक मुसलमानी
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