मालोजी भोंसले के साले को बनंगपाल निम्बालकर के नाम से पुकारते हैं। कोई कोई उसे जगपाल के नाम से भी पुकारते थे। जगपाल अपने समय में एक नामी लड़ाकू वीर हो गया है। बीजापुर के राज्य में उसका वंश दूसरे नम्बर का था परन्तु स्वतन्त्रता की अभिलाषा ने जगपाल को स्वतन्त्र लड़ाइयों और लूट मार करने पर प्रस्तुत कर दिया। जगपाल की बहिन मालोजी को व्याही थी, ’’भोंसले’’ उनके राजवंश की उपाधि थी। ठीक पता नहीं चलता कि यह भोंसले शब्द किस शब्द का अपभ्रंश रूप है। एक मुसलमान इतिहास लेखक ने लिखा है कि ’’भोंसले’’ शब्द ’घोसले’ का अपभ्रंश है। चुंकि इनका प्रथम पूर्वज अर्थात् वह वीर जो पहले पहल राजपूताने से पिता के साथ महाराष्ट्र में आया, वर्षो तक जंगलों में भटकता रहा, इस कारण इस का घोंसला वंश हो गया जो बिगड़ कर भोंसले हो गया। परन्तु ग्रान्टडफ़ साहब इसका कुछ और कारण


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को जो सहयोग दिया उसका प्रमुख कारण यह था कि बादशाह ने इन राजपुत राजाओं को अपने राज्यों पर शासन करने की छुट दे रखी थी।

अकबर के पश्चात् जब जहांगीर गद्दी पर बैठा तो उसने अपने पिता के नियमों को जारी रखा। शाहजहां ने भी हिन्दुओं की सहायता से ही राजगद्दी प्राप्त की किन्तु उसने अपने दादा अकबर की नीति को कुछ बदल डाला। शाहजहां के समय तक देश में मजहब के नाम पर पक्षपात की बहुत कम घटनाएं हुई। शाहजहां के दरबार में राजपुतों का वर्चस्व था और वे सम्मान


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