दिखाई और कीर्ति के अधिकारी हुए। इस लड़ाई में उनके श्वसुर यादवराव भी उपस्थित थे। यद्यपि ’मलिक’ हार गया परन्तु समस्त इतिहास लेखक मानते हैं कि इस हार के उत्तदायी मरहठे न थे। इस लड़ाई में शाहजी भोंसले और यादवराव ने जो कार्य कर दिखाया उससे मुगलों की सेना में

छत्रपति शिवाजी 35

मरहठों की पूरी धाक जम गई और मुगल सेनापति इस प्रबन्ध में लग गया कि येन केन प्रकारेण मरहठों को अपने में मिलावें। कुछ दिनों बाद यादवराव, मलिक अम्बर से बिगड़कर मुगल सेना से मिल गये जिसके फलस्वरूप 15 सवार उनके अधिकार में दिये गये। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि मुगल सम्राट् के प्रतिनिधियों ने जो दक्षिण में लड़ रहे थे सम्राट् की आज्ञानुसार एक मरहठे सरदार की कितनी प्रतिष्ठा की। जो सम्बन्धी उनके साथ आये थे उनको भी बड़े बड़े पद और अधिकार दिये गये, परन्तु शाहजी भोंसले


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प्रबल सेना ने मुसलमानी सेना के सात सौ सिपाहियों को मार कर अपने धर्म की रक्षा की। अब बहमनी राज्य भी पतन की ओर बढ़ चला और इसके स्थान पर पांच मुसलमान बादशाहों ने अपने स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिये। ये थे-1.बरार, 2. बीजापुर, 3. गोलकुण्डा, 4. बीदर, और 5. अहमद नगर। समय के परिवर्तन से ये पांच राज्य तीन बनकर रह गये- बीजापुर, गोलकुण्डा और अहमदनगर। बीजापुर पर आदिलशाही बादशाहों का राज्य रहा और अहमदनगर निजामशाही के नाम से प्रसिद्व


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