अपने श्वसुर के साथ नहीं आया थां वह अपनी मरहठा सेना लिऐ अपने स्थान पर डटा रहा। सन् 1667 ई. में शाहजहां मुगल राज्य के सिंहासन पर बैठा। शाहजहां की उस सेनापति से जो दक्षिण के मैदान में लड़ रहा था कुछ रंजिश थी। उसने तुरन्त ही खांजहां लोदी को दक्षिण के युद्व से वापस बुला लिया। जब खांजहां लोदी दरबार में आया तो उसे कुछ बेइमानी के लक्षण दिखाई पड़े। वह झट भाग कर दक्षिण चला गया और निजामशाही (अहमदनगर) राज्य की शरण में रहने लगा। शाहजहां ने इसके पीछे बहुत सी सेना भेजी। परन्तु दक्षिण की समस्त हिन्दू रियासतों ने और शाहजी भोंसले आदि ने खांजहां लोदी को मदद दी, खूब डट कर लड़ाई हुई। फलस्वरूप मुसलमानी सेना को अधिक हानि उठानी पड़ी और विफल मनोरथ ही सेना वापस लौटी। इस पराजय से शाहजहां को इतना क्रोध आया कि स्वयम् एक बड़ी सेना लेकर दक्षिण की


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हुआ। इसका संस्थापक अहमद नामक व्यक्ति था जिसका बाप ब्राह्यण था और जो बीजापुर में रहता थां अहमद का यह ब्राह्यण पिता एक युद्व में बीजापुर वालों के हाथ पड़ गया और जबरदस्ती मुसलमान बना दिया गया। मुसलमान बन जाने पर इसका अधिकार इतना बढ़ा कि यह बीजापुर रियासत का सर्वोच्च शासक बन गया। इसके बेटे ने बीजापुर के बादशाह से विरोध किया, नई राजधानी कायम की और उसका नाम अहमदनगर रखा। बीजापुर और अहमदनगर दोनों राज्यों की नीति अकबर की नीति के समान


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