ओर चला। अन्त में डट कर युद्व हुआ परन्तु खांजहां हार कर भाग गया। शाहजी भोंसले ने देखा कि जिसके लिए हम मुगलवंश से युद्व कर रहे थे वह भाग निकला तो उन्होंने भी सन्धि कर ली। बादशाह शाहजहां ने शाहजी भोंसले की बड़ी प्रतिष्ठा की और छः हजार का अधिकार देकर पांच हजार सवार का अफसर बना दिया और पहली सम्पत्ति के अतिरिक्त

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और बहुत सी सम्पत्ति दी।

इतना होने पर भी शाहजी भोंसले पूर्ववत् निजामशाही राज्य का शुभचिन्तक बना रहा परन्तु जब निजामशाही राज्य के प्रधान फतेहखां ने अपने बादशाह का वध करके शाहजहां से सन्धि करने का विचार किया किन्तू सन्धि के नियमों पर स्थिर न रहा तो शाह जी भोंसले निजामशाही राज्य छोड़कर बीजापुर के दरबार में चला गया। उन दिनों शाहजी भोंसले का दक्षिण में बड़ा जोर था। आदिलशाह (बीजापुर) बादशाह से शाहजी का मिल जाना बहुत अच्छा


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थी। दोनों का शासन प्रबन्घ हिन्दुओं के हाथ में था । सभी पहाड़ी किले हिन्दुओं के अधिकार में थे और ऊंचे पद भी हिन्दुओं के पास थे। आदिलशाही राज्य में एक हिन्दू रईस को बारह-हजारी के पद पर नियुक्ति मिली। इस वंश के शासकों ने यह आज्ञा निकाली कि सरकारी दफ्तरों में उर्दू के बजाय मराठी भाषा का प्रयोग किया जाये। राज्यों में हिन्दुओं का जोर बढ़ता रहा। निजामशाही राज्य में भी यही नीति प्रारम्भ में जारी रही और हिन्दुओं को प्रतिष्ठा मिलती रही। बुरहान नामक बादशाह ने अपने प्रधानमंत्री कुंवरसेन को


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