हुआ। इस समय फतेहखां ने शांहशाही सेनापति महाबत खां से झगड़ा कर दौलताबाद अर्थात् बीजापुर की राजधानी पर चढ़ाई कर दी। शाहजी भोंसले इसके साथ खूब वीरता से लड़ते रहे परन्तु अन्त में हार गये। बीजापुर वालों ने फतेहखां से सन्धि की बातचीत की जिसमें एक शर्त यह थी कि फतेहखां शाहजी भोंसले को वीरता से युद्व करने के बदले बहुत कुछ पारितोषिक दें। चतुर फतेहखां ने बीजापुर वालों से सन्धि करते ही मुगल सेना पर आग बरसाना आरम्भ कर दिया जिसको देख कर महाबतखां को बहुत क्रोध आया और उसने फतेहखां को गिरफ्तार करने का प्रबन्ध किया । जब फतेहखां हाथ में आ गया तब महाबतखां ने ठानी कि शाहजी भोंसले को जीतना चाहिए क्योंकि तभी बीजापुर व अहमदनगर पूर्ण रूप से अपने हाथ में आ जायेंगे। परन्तु मुसलमानी सेनापति ने सब से पहले यह काम किया कि शाहजी भोंसले की स्त्री और पुत्र को जो नीरापुर
पेशवा का खिताब दिया। किन्तु बाद में इसी वंश के बादशाहों ने शिया और सुन्नी के मतभेद पर
विज्ञप्ति 23
जोर देकर अपने राज्य का नाश कर डाला।
इन मुसलमानी राज्यों के अलावा दक्षिण में विजयनगर का राज्य अन्यन्त शक्तिशाली था। इतिहासकार फरिश्ता इस राज्य को वर्गी कह कर पुकारता है। फरिश्ता ने लिखा है कि वर्गी जाति के लोग मुसलमानों को तंग करते रहे तथा 1578 में इन्हें पराजित किया। बादशाह ने अपने सेनापति की सहायता से इन वर्गी लोगों को वश में करने की चेष्टा की किन्तु एक