के निकट ठहरे हुए थे गिरफ्तार करने का प्रयत्न किया। एक मुसलमान सेनानायक ने धोखा देकर उनको गिरफ्तार भी किया परन्तु जब मराठा सरदारों ने यह समाचार सुना तो जमानत देकर स्त्री को छुड़ा कर गोदवाना के किले में पहंुचा दिया। एक नई चाल शाहजी भोंसले ने इसी बीच और चली। फतेहखां वजीर (अहमदनगर का) उस समय गिरफ्तार ही था। फतेहखां ने जिस बादशाह को तख़्त

छत्रपति शिवाजी 37

पर बैठाया था उसे मुगल सेना ने पकड़ कर ग्वालियर के किले में कैद कर दिया। शाहजी भोंसले ने तुरन्त अहमदनगर के शाही खानदान के एक कम अवस्था वाले बालक को सिंहासन पर बिठा दिया और आप उसका प्रबन्धकर्ता बन बैठा। बीजापुर के राज्य में इस समय दो बलशाली सरदार थे जो मुरारपन्त और अब्दुल्ला खां के नामों से प्रसिद्व थे और गुप्त रूप से शाहजी भोंसले के सहायक थे। महाबतखां और उसका बेटा दोनों इस


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विश्वासघाती के कारण यह सम्भव नहीं हो सका। बहुत दिनों तक सारे देश में गड़बढ़ी मची रही। मुगलों ने हिन्दू राजपुतों की सहायता से दक्षिण पर चढ़ाई की । सब से भयंकर आक्रमण औरंगजेब का था जिसने इस्लामी झण्डे के अन्तर्गत सारे भारत में हलचल मचा रखी थी। ठीक इसी समय दक्षिण और पंजाब में दो शक्तिशाली जातियां पैदा हुई जिन्होंने मुसलमानी सत्ता को चकानाचूर कर दिया। इन दोनों शक्तियों के भीतर धार्मिक सुधार का भाव भी काम कर रहा था।

पंजाब में गुरू नानक ने हिन्दुओं को बताया


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