लड़ाई में पूर्ण रूप से हारे। जब शाहजहां ने यह चालबाजी सुनी तो क्रोध से जल उठा। फलस्वरूप उसने एक बड़ी सेना के साथ औरंगजेब को जो उस समय नवयुवक था दक्षिण की ओर रवाना किया। साथ में दो और सेनापति ’जनरल खांजमां वा ख़ानदौरा नियत किये गये परन्तु वे शाहजी भोंसले के सम्मुख युद्व में न ठहर सके। अन्त में शाहजहां ने शायस्ता खां और ख़ानदौरां नियत किये गये परन्तु वे शाहजी भोंसले के सम्मुख न ठहर सके। अन्त में शाहजहां ने शायस्ता खां और अलीवर्दी खां को उनकी सहायता के लिए भेजां इन चारों ने मिलकर फिर शाहजी भोंसले से लड़ाई छेड़ दी। पूरे दो वर्ष लड़ाई होती रही परन्तु शाहजी इनके हाथ न आये। लाचार होकर शाहजहां ने बीजापुर के बादशाह के साथ सन्धि करने का प्रस्ताव किया अन्त में शाहजी भोंसले ने मुकाबला छोड़ दिया।
शाहजी भोंसले उस समय अपनी वीरता और चतुराई के कारण पूर्ण
कि वे जातिभेद को त्यागें और ईश्वर के सहारे जीवन बितायें। इस सामायिक शिक्षा का हिन्दुओं पर अच्छा प्रभाव पड़ा। हिन्दुओं में शक्ति का संचार हुआ और मुसलमानों की कट्टरता भी कम हुई। गुरू नानक के बाद के गुरूओं ने अपना यह काम जारी रखा। मुसलमान अधिकारियों ने गुरूमत को फैलता हुआ देखा तो उन्होंने हिन्दुओं को सताना शुरू कर दिया। जब सिखों ने देखा कि अब मात्र ईश्वरभक्ति ही पर्याप्त नहीं है तो गुरूओं ने धर्म रक्षा के लिए तलवार उठाई। सिखों को वीर जाति के रूप मेें विकसित होता देख कर