बढ़ गया। फल स्वरूप सन् 1630 ई. में शाहजी ने दूसरी शादी कर ली जिससे जीजीबाई मुसलमानों के कब्जे में फंस गई। वह अपने पिता के एक सम्बन्धी के साथ थी। शिवाजी पर कोई आपत्ति न आ सकती थी क्योंकि इस उसने अलग छिपा रखा था।
छः वर्ष का बालक मुसलमान आक्रमणकारियों के हाथ से बचता और भागता फिरता है। जब उसी अवस्था में आजकल के बच्चे गलियों और बाजारों में खेलते फिरतें हैं। माताएं इस बात की चिन्ता भी नहीं करती कि उनका बालक कहां खेल रहा है? शिवाजी की माता अपने बच्चे को छिपाती थी और बड़ी सावधानी से उसको ऐसे स्थान पर रखती थी जहां से वह दुश्मनों के हाथ से बचा रहे। सन् 1636 ई. तक शिवाजी को अपने पिता का दर्शन प्राप्त नहीं हुआ था। अन्त में धीरे धीरे शिवाजी के पिता माता में पुनः प्रेम हो गया। शाहजी ने शिवा की शादी कर दी और कुछ दिन बाद फिर कर्नाटक की लड़ाई को रवाना हुए। शिवाजी माता के साथ पूना में विश्राम लेते रहे।
समर्पण से शिक्षा लेकर धर्म के लिए सर्वस्व बलिदान करने की प्रतिज्ञा की । जिस धर्मयज्ञ में गुरू तेग बहादुर ने स्वयं की बलि दी थी, उसमें उनके पुत्र गुरू गोविन्द सिंह ने अपने चारों पुत्रों की आहुति दे दी। दशम गुरू गोविन्द सिंह ने एक हाथ में भक्ति का प्याला उठाया तो दूसरे हाथ में जाति रक्षा के लिए तलवार धारण की । संसार ने गुरू जी की भक्ति और शक्ति के जलवे को देखा।
पंजाब में सिख धर्म जो काम कर रहा था, वही दक्षिण में महाराष्ट्र में हो रहा था। महाराष्ट्र की यह धती स्वामी दयानन्द