शिवाजी के बाल्यकाल की एक कहानी इस प्रकार प्रसिद्व है जिससे उनके आगामी पवित्र जीवन का वृत्तान्त
छत्रपति शिवाजी 39
भली प्रकार मालूम होता है। कहते हैं कि जब शाहजी भोंसले बीजापुर दरबार में थे तब एक दिन ’मुरार पन्त’ ने शिवाजी से कहा ’’ चलो आज तुमको दरबार में ले चलें और बादशाह को सलाम करायें।’’ होनहार बालक ने इसमें प्रसन्नता के बदले घृणा प्रकट की और कहा कि हम हिन्दू हैं और बादशाह यवन है, महायवन है, महानीच है। हम गौ और ब्रह्यण के सेवक हैं और वह उनका शत्रु है। हमार और उसका मेल नहीं हो सकता। मैं ऐसे मनुष्य से सलाम करना नहीं चाहता जो हमारे धर्म का शत्रु है। उसे तो मैं छूना भी नहीं चाहता। मैं ऐसे मनुष्य को कभी बादशाह नहीं मान सकता और न कभी उसका अदब कर सकता हूं। सलाम तो एक तरफ रहा, मेरे मन में यह बात आती है कि उसका गला काट डालूं।
की जन्मभूमि गुजरात से अधिक दूर नहीं है। पंजाब में धर्मसुधार का जो कार्य गुरू नानक ने किया वही काम महाराष्ट्र के तुकाराम, एकनाथ, नामदेव, ज्ञानेश्वर आदि सन्तों ने किया। छूतछात के भूत को भगा कर इन सन्तों ने सच्ची ईश्वरभक्ति का पाठ पढ़ाया। गुरू गोविन्द सिंह ने तो अपने धर्मात्मा पिता के शव को छूकर शपथ ली थी कि जिन लोगों ने मेरे पिता को मारा है, उनसे मैं बदला अवश्य लूंगा। केवल बदला ही नहीं लूंगा किन्तु इस पवित्र भारत भूमि से अत्याचारियों को समूल नष्ट कर दूंगा। अपने पूर्वजों के धर्म की रक्षा करने के लिए सर्वस्व अर्पित कर दूंगा।