जिस समय मुरार पन्त ने बच्चे शिवाजी की यह भोली बात सुनी तो आश्चर्य करने लगा और उसके माता पिता को समस्त समाचार सुनाया। माता पिता दोनों ने बच्चे को समझाया कि यह समय ऐसी बातें करने का नहीं है। इस समय मुसलमानों का आधिपत्य है। उनके बादशाह को सलाम करना हमारा फर्ज है। इस प्रकार समझा बुझा कर शिवाजी को दरबाार में ले गये परन्तु वहां जाकर शिवाजी ने बादशाह को सलाम नहीं किया। शाहजी और मुरारपन्त ने यह कह कर बात टाल दी कि अभी ’बच्चा’ है दरबार का नियम नहीं जानता। शिवाजी जब दरबार से घर वापस आया तो उसने स्नान किया और नवीन वस्त्र बदले।
शाहजी को अपने नौकरों में सिर्फ दो नौकरों पर पूरा विश्वास था। उनमें से एक का नाम दादा जी कोंड़देव था। दादाजी कोंडदेव के अधीन पूना का प्रबन्ध था जहां पर शिवाजी तथा उनकी माता रहा करती थी। दादाजी कोंड़देव एक
गुरू जी के इन विचारों ने लोगों में देश और जाति सेवा का भाव भरे। ज्यों ही मुगल सेना ने दक्षिण की मुसलमान सल्तनतों का खात्मा करना शुरू किया और औरंगजेब ने मजहबी कट्टरता का नग्न रूप दिखाया, हिन्दुओं को विश्वास हो गया कि अब हमारे धार्मिक अधिकार बच नहीं पायेंगे। नाना प्रकार से हिन्दुओं का धर्म भ्रष्ट किया जाने लगा और उनके दमन में कोई कसर नहीं रखी गई। तत्कालीन हिन्दी कवियों ने ईश्वर भक्ति के काव्य की रचना कर समाज में व्याप्त अधर्म, अत्याचार तथा हिन्दुओं के दमन का सजीव