बड़ा बुद्विमान और चतुर आदमी था। इसी ने शिवाजी को उत्तमोत्तम शिक्षा दी थी। जो उसका कत्र्तव्य था उस सब को उसने बड़ी बुद्विमानी से पूर्ण किया। जागीर का प्रबन्ध इस

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उत्तमता से किया कि खेती में खूब उन्नति होने लगी और इलाके की समस्त पहाड़ी आबादी को, जिसको मावली के नाम से पुकारा जाता था अपना सेवक बना लिया। प्रजा बहादुर और योद्वा किन्तु निर्धन थी। उसने कई वर्ष तक इन लोगों से मालगुजारी नहीं ली। प्रजा के बहुत से आदमियों को अपने यहां नौकर रखा और उनके पालन पोषण का प्रबन्ध किया। दादाजी कोंड़देव की यह दूरदर्शिता शिवाजी के काम आई। जहां उसने जागीर का प्रबन्ध उत्तम किया था वहां शिवाजी की शिक्षा की भी पूरा ध्यान रखा था। इस समय मरहठों में पढ़ने लिखने की इतनी चर्चा नहीं थी बल्कि युद्व-विद्या को ही प्रधान कत्र्तव्य समझाा जाता था। शिवाजी बाल्यकाल में घोड़े की सवारी में


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विज्ञप्ति 25

चित्र अंकित किया है। इस काव्य ने भी अधोगति प्राप्त लोगों को धर्म रक्षा के लिए आने की प्रेरणा दी। शिवाजी महाराज के प्रयत्न भी इसी दिशा में थे। जब हिन्दुओं ने देखा कि हमारी भक्ति और उपासना की स्वतन्त्रता भी मुसलमानों द्वारा बाधित की जाती है तो उनमें स्वधर्म रक्षा का जो जोश उमड़ा उसके आगे मुगल सेना और शाही तलवार भी कांप गई।

शिवाजी और गुरू गोविन्द सिंह पर लिखते समय यदि हम महाराणा प्रताप को भुला दे ंतो यह अन्याय होगा। मुगलवंश को मजा चखाने में वीर प्रताप


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