अद्वितीय तथा शस्त्रविद्या में अनुपम हो गये थे। लक्ष्य लगाने, भाला चलाने और तलवारों के प्रयोग करने में भी सब जगह प्रसिद्व हो गये थे। उन समस्त गुप्त रीतियों और हथकण्डों को भी दादा जी कोंड़देव की कृपा से जान लिया जो उन जैसे वीरों के लिए आवश्यक था। रामायण और महाभारत की कथा में उनको बड़ी भक्ति थी। यह भक्ति और प्रेम यहां तक बढ़ गये थे कि बड़ी अवस्था होने पर अपने प्राणों को संकट में डाल कर भी जहां कथा होती थी वहां पहुंच जाते थे। थोड़ी ही अवस्था में मुसलमानों के अत्याचार को देखकर उनसे उन्हें इतनी घृणा हो गई थी जो समस्त जीवन उनके हृदय में बनी रही। शिवाजी को अपनी युवावस्था में मावलियों से मिलने का अवसर बहुत मिला। उनसे मिलकर उनके गुणों को अच्छी प्रकार पहिचान लिया और आरम्भ ही से ऐसी मित्रता की कि अन्त तक वे सब शिवाजी के सहायक बने रहे।

जागीर के प्रबन्ध में भी


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तथा उनके वंशजों ने जो किया, उसे भुलाना कठिन है। महाराणा सांगा के राजसिंहासन पर जब प्रताप विराजमान हुए, उस समय मुगलों के अत्याचार सीमातीत स्थिति तक पहुंच गये थे। अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहने वाले महाराणा ने अपने प्यारे बच्चों को भूख से तड़पते और बिलबिलाते देखा तथापि उनके मन में मुगलों की अधीनता स्वीकार करने का विचार एक बार भी नहीं आया। उस समय के राजपुतों में फूट और विरोध पराकाष्ठा पर पहंुच चुका था। खुद महाराणा का भाई शक्तिसिंह अकबर के दरबार में


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