इस जाति की भाषा ने संसार की विभिन्न प्रचलित भाषाओं को जन्म दिया है। इसके शिल्प और ज्ञान को अन्यों ने सीखां इस जाति के आविर्भाव के पश्चात् न जाने कितनी जातियां इस पृथ्वी पर जन्मीं और नष्ट हुई किन्तू समय के घात प्रतिघात को सहते हुए आज भी यह जाति जीवित है, यद्यपि जराजीर्ण अवश्य हो गई है।

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अनेक लोग हमारी उक्त धारणा से सहमत नहीं हैं किन्तू उन्हें यह जान लेना चाहिए कि हमारे उक्त कथन को अनेक पाश्चाात्य विद्वानों ने अपनी खोज और शोध के द्वारा सत्य पाया है। यह स्वीकार किया जा चुका है कि संस्कृत भाषा वर्तमान में प्रचलित इण्डो-आर्यन परिवार की भाषाओं की जननी है। इस परिवार में यूरोप की प्रायः अधिकांश भाषाओं के अलावा जें़द पुरानी फारसी तथा पश्तों आदि भाषांए भी सम्मिलित हैं। यह सम्भव है कि अन्य भाषाओं का मूल भी इसी संस्कृत भाषा को मान लिया जाये।

कालक्रम से भारत में


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न तो परिष्कृत था और न गद्य लेखन में एकरूपता आ पाई थी। शब्दों के रूप् अभी स्थिर नहीं हुए थे और वाक्य-रचना भी प्रायः अटपटी रहती थी। छत्रपति शिवाजी के प्रस्तुत हिन्दी

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अनुवाद की भी यही स्थिति थी, किन्तू आज के पाठकों के समक्ष यह महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ सुसम्पादित रूप में जाये, इस तथ्य को ध्यान में रखकर सम्पादक ने इसके कुछ अंश का पुनर्लेखन किया है तो अवशिष्ट अध्यायों की भाषा का परिष्कार कर उसे अद्यतन गद्य के निकट लाने का प्रयास किया है। ऐतिहासिक दृष्टि से


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