दादाजी कोंड़देव ने शिवाजी को पूर्ण शिक्षित किया था जिसके कारण वे सर्वप्रिय हो रहे थे। शिवाजी के हृदय में स्वतन्त्रता की अभिलाषा पहले ही से थी जो अपना रंग दिखाने लगी। कभी कभी शिवाजी दिन भर गायब रहते थे और ऐसे लोगों से मिलते जुलते रहते थे जो

छत्रपति शिवाजी 41

किसी राज्य के अधीन नहीं थे और न किसी कानून के पाबन्द थे। रात दिन जंगलों में घूमते फिरते। यहां तक कि कुछ लोग यह ख्याल करने लगे कि शिवाजी डाकुओं के साथ मिल गये। ये सब शिकायतें दादाजी कोंड़देव के पास तक पहुंची। इसकी रोक के वास्ते जागीर का बहुत बड़ा हिस्सा शिवाजी को सौंप दिया गया। इससे इतना प्रभाव पड़ा कि दिन भर वह कहीं बाहर न जाने लगे परन्तु जो चीज उनकी प्रकृति में मिल गई हो वह कैसे दूर की जा सकती थी? शाहजी की जागीर में कोई दुर्ग नहीं था इसलिए आत्मरक्षा और धर्मरक्षा के लिए किसी दुर्ग का होना


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एक पद स्वीकार कर चुका था और बादशाह का पक्ष लेकर महाराणा के विरूद्व तलवार उठा चुका था।

चित्तौड़ का किलाा मुगलों के अधीन था किन्तू अवशिष्ट राजपुताना पूर्ण स्वतन्त्र था। महाराणा प्रताप के बाद उदयपुर की राजगद्दी पर बैठने वाले किसी शासक के मन में प्रताप जैसी देशभक्ति की भावना नहीं जगी। यद्यपि मेवाड़ ने न तो अन्य राजपुत राजाओं की भांति मुगलों को अपनी बहिन बेटियां दीं और न उनकी अधीनता स्वीकार की तथापि यह राज्य भी अपनी स्वतन्त्रता को स्थिर नहीं रख सका। यहां राजनैतिक परिर्वतन


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