अत्यन्त आवश्यक था। शिवाजी के मस्तिष्क में यह विचार रह रह कर जोश मारने लगा कि किसी तरह कोई किला हाथ आवे। हम पहले लिख चुके हैं कि मावली लोगों के चित्त को तो शिवाजी पहले ही वशीभूत कर चुके थे और देश के दुर्गम मार्ग शिकार खेलने के समय ही देख चुके थे। अतएव किसी किले को प्राप्त करना शिवाजी के लिए कोई कठिन काम न था। वह अपने मन की तरंग में सब कुछ कर सकते थे।

पूना में पश्चिमी भाग में करीब 20 मील की दूरी पर ’तोरण’ नामक पहाड़ी किला था। इस किले का मार्ग बहुत कठिन और दुर्गम था। शिवाजी ने अपने मावली साथियों की सहायता से तोरण किले के अध्यक्ष से परिचय प्राप्त किया और उसको किसी प्रकार इस बात पर प्रसन्न कर लिया कि वह तोरण किला उनको शिवाजी दे देवे। शिवाजी के जीवन का सबसे प्रथम कार्य जो बिना युद्व किये ही समाप्त हुआ, वह तोरण के दुर्ग को प्राप्त


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का दौर चलता रहता था। राजपुतों के इतिहास में वीर दुर्गादास का नाम आता है जिसने अपने बल और पराक्रम का


26 छत्रपति शिवाजी

परिचय देकर औरंगजेब के गर्व को नष्ट किया था। दुर्गादास जोधपुर के राठौर वंश के सपूत थे। जोधपुर के महाराजा जसवन्तसिंह की काबुल में मृत्यु के पश्चात् जब औरंगजेब नक उनकी रानी और पुत्रों को दिल्ली में बन्दी बना लिया तो इनकी रक्षा करने वाले दुर्गादास ही थे। इन्होंने राजकुमार को सुरक्षित जोधपुर पहंुचाया और मुगलों से युद्व कर मारवाड़ का राज्य


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