और नया किला बनाने की नींव डाली। तोरण किले से तीन मील की दूरी पर ’महोविदा’ की पहाड़ी पर उसने एक और किला तैयार कर लिया जिसका नाम राजगढ़ रखा। यह किला सदा शिवाजी के ही अधीन रहा।
जब इस समस्त कार्यवाही का समाचार बीजापर पहंुचा तब उन्होंने शिवाजी के पास इस अभिप्राय का एक परवाना लिख भेजा जिससे कि अपनी इन चालबाजियों से हाथ खींच ले और साथ ही शाहजी के पास भी पत्र लिख भेजा कि वह अपने पुत्र शिवाजी को समझा देवे। पत्रोत्तर में शाहजी ने बादशाह बीजापुर को पत्र लिख दिया कि मेरे बेटे ने बिना मेरी सम्मति लिये यह काम किया है। मैं और मेरे सम्बन्धी दरबार के शुभचिन्तक हैं अतएव बहुत सम्भव है कि शिवाजी ने जो कुछ किया है वह जागीर की उन्नति और रक्षा ही के निमित्त किया हो।
इधर शाहजी ने दादाजी कोंड़देव के पास पत्र लिखकर अप्रसन्नता प्रकट की और कहला भेजा कि
की गुलामी में रहे ही नहीं। कायरता की कलंक कालिमा हिन्दुओं पर नहीं लग सकती और न कोई यह कहने का साहस करेगा कि हिन्दू कभी कायर थे या भविष्य में होंगे। जाति के तौर पर हिन्दू कभी कायर नहीं रहा। जिस जाति ने अधिसंख्य शूरवीरों को उत्पन्न किया, जिस जाति में राजपूत, सिख, मराठा और जाट जैसी योद्वा जातियां पैदा होती रहीं उसे कायर कहना उचित नहीं। जो मुसलमान हिन्दुओं को कायर कहते हैं वे अपने गिरेबान में मुंह डाल कर देखें, उन्हें सच्चाई का पता चल जायेगा कि उनमें से अधिकांश