वे भविष्य में शिवाजी को ऐसा कार्य करने से रोकें। इस समाचार के सुनते ही शिवाजी को बड़ी चिन्ता हुई। एक ओर थी पिता की आज्ञा और दूसरी ओर थी धर्म और राज्य प्राप्त करने की प्रबल इच्छा। उस समय शिवाजी के हृदय में तरह तरह के विचार उठ रहे थे अद्भूत दशा में उसका चित्त गोते लगा रहा था।
छत्रपति शिवाजी 43
अन्त में उसने अपनी प्यारी स्त्री से सम्मति ली। स्त्री ने सनातन रीत्यनुसार पहले तो यह कहा कि स्त्रियों की सम्मति ठीक नहीं होती कारण कि उनमें बुद्वि कम होती है। परन्तू यदि आप मेरी सम्मति लेना ठीक समझते हैं तब तो गौ- ब्राह्यण तथा धर्म रक्षा करना अधिक श्रेयस्कर है, चाहे इनके करने में पिता की आज्ञा का उल्लघंन ही क्यों न करना पड़े। स्त्री ने यह भी कहा कि शाहजी यहां से दूर हैं, उनको क्या मालूम किइस इलाके में कौन कौन सी विपत्ति पड़ रही है। यदि वे यहां होते तो कभी ऐसा न करते वरना आपको और अधिक सहायता देते।
उन्हीं हिन्दुओं की सन्तान हैं जिन पर वे कायरता का दोष लगाते हैं। भारत के अधिसंख्य मुसलमान रईस हिन्दुओं की संतान हैं। हमारा दावा है कि हिन्दुओं का कोई वर्ग कायर नहीं हैं। कायरता का आरोप मुख्यतः बंगालियों तथा बनियों पर लगाया जाता है किन्तू यह याद रखना होगा कि इन दोनों वर्गो में अनेक वीर हुए हैं। बख्तियार खिलजी ने नदिया (बंगाल) की विजय
विज्ञप्ति 27
का मनसूबा बनाया किन्तू उसे पराजित होकर लौटना पड़ा। प्रायः वाणिज्य व्यवसाय करने वाले लोग लड़ाई-भिड़ाई से दूर रहते