शिवाजी की इच्छा तो प्रबल थी ही, साथ ही स्त्री की सम्मति ने अग्नि में घी की आहुति दे दी। फिर क्या था? शिवाजी के विचार और भी दृढ़ हो गये। यद्यपि दादाजी ने भी आदेशानुसार उसे समझाया था क्योंकि दादाजी शिवाजी के रक्षक थे। तब भी कभी कभी दादाजी शिवाजी को ऐसे उत्तर दे दिया करते थे जिससे वह सदैव प्रसन्न रहे। शिवाजी के हृदय में धर्मरक्षा की ज्वलन्त अग्नि धधक रही थी। दादाजी भी समझ गये कि शिवाजी के विचार अटल हैं। अतएव चुप रह जाने के अतिरिक्त दादाजी ने और कोई कार्यवाही नहीं की। कुछ दिनों के उपरान्त दादा कोंड़देव का स्वर्गवास हो गया।
मरने के कुछ दिन पहले दादाजी ने शिवाजी को अपने पास बुलाया और बजाय इसके कि वह शिवाजी को अपने काम से रोकते यह उपदेश दिया- बेटा! धीरता से स्वतंत्र होने की चेष्टा करना। धर्म, गो-ब्राह्यण और प्रजा की रक्षा करना। हिन्दुओं के मन्दिरों को नष्ट भ्रष्ट होने
हैं किन्तू राजपूताना के अनेक अग्रवालों ने अपने राज्य की दीवानगीरी तथा खजाने को संभालने के काम को त्याग कर अपने हाथों में तलवार उठाई थी। वे राजपूत सरदारों के साथ युद्वों में लड़े भी थे। महाराष्ट्र के ब्राह्यणों में वीरता आज तक पाई जाती है। क्षत्रिय ही वैश्यों का व्यवसाय धारण कर ’खत्री’ बन गये । इन खत्रियों ने महाराजा रणजीतसिंह के समय में जो वीरता दिखाई उसे लोग अभी तक नहीं भूले हैं। सीमान्त प्रदेश के अफगान इन खत्रियों की वीरता से पराजित हैं। हमारे लिखने का अभिप्राय इतना