से बचाना और अपना नाम जगत् में फैलाना। वृद्व शिक्षक के इस उपदेश ने वीर शिवाजी के हृदय में नवीन उत्साह का संचार कर दिया। बस फिर क्या था, खुलेआम कार्य आरम्भ कर दिया गया। जिसका अधिक भय था उसने भी मरते मरते शिवाजी को कर्तव्य पूरा
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करने की आज्ञा दे दी। दादाजी की आज्ञा उसके लिए ईश्वर की आज्ञा थी जिसका पूरा करना शिवाजी ने अपना परम कर्तव्य समझा।
दादाजी के मरने के बाद शिवाजी ने अपने पिता की तरफ से जागीर का प्रबन्ध अपने हाथ में ले लिया जब शिवाजी के पिता ने शेष मालगुजारी का हिसाब मांगा तो उसने उत्तर में लिख भेजा िकइस निर्धन इलाके की आमदनी इसके व्यय के ही लिए काफी होती है, बचने बचाने की कोई गुंजाइश नहीं है। सारी जागीर में केवल दो आदमी ऐसे थे जो शिवाजी से सहमत नहीं थे। इसलिए यह आवश्यक था कि वे या तो अपने पक्ष में हो
ही है कि मुसलमानी शासनकाल में कोई वक्त ऐसा नहीं था, जब हिन्दुओं में वीरता, धैर्य, बल और पराक्रम की कमी रही हो। यदि हिन्दुओं में वीरता और साथ ही कष्ट सहिष्णुता नहीं होती तो आज भारत में बीस करोड़ हिन्दु नहीं पाये जाते। अब तो अंग्रेजी सेना में भी आधे सिपाही हिन्दुस्तानी हैं। इन फौजों में गोरखा और सिखों को सर्वाधिक सम्मान प्राप्त है। आज महारानी विक्टोरिया के शासन में सर्वत्र शान्ति है इसलिए कोई भी धर्म या समुदाय अपनी वीरता के प्रदर्शन का अवसर प्राप्त नहीं कर पाता। अंगे्रजी सरकार