जायें या एकदम पृथक हो जायें उन विपक्षियों में से एक का नाम फ़िरंगाजी नरसला था और दूसरे का नाम सम्भाजी मोहिते था। पहला ’चाकन’ नामक जिले का अध्यक्ष था और दूसरा शाहजी की दूसरी स्त्री शिवाजी की सौतेली मां का भाई था जो एक सूबेदार था। शिवाजी के दूतों ने फिरंगाजी को तो अपने पक्ष में कर लिया परन्तु सम्भाजी मोहिते रह गया। शिवाजी इसी चिन्ता ही में था कि ’गोन्दवाने’ का किला भी उसके हाथ आ गया। किले के रक्षक ने जो मुसलमान था, एक बड़ी भारी रकम रिश्वत में लेकर किला शिवाजी को सौंप दिया। यह किला और किलों से बड़ा और उचित स्थान पर था जिसका नाम शिवाजी ने ’ सिंहगढ़’ रक्खा और इसी नाम से वह अब तक प्रसिद्व है।

सम्भाजी मोहिते के पास तीन सौ चुने हुए सवार थे और सूबे में उसका अधिकार था। शिवाजी के कई बार पत्र लिखने पर भी वह चिकनी चुपड़ी बातें करता रहा परन्तु शाह जी की


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ने अपनी बुद्विमत्ता से समस्त जाति को हथियारों से रहित कर दिया है। अतः यह आशा नहीं होती कि निकट भविष्य में हम लोगों को अपनी वीरता या पराक्रम दिखाने का अवसर मिलेगा। इस समय तो कायरता या वीरता की चर्चा केवल दिल बहलाने या मौखिक शास्त्रार्थ के लिए होती है। अब तो वीरता का उदाहरण क्रिकेट या फुटबाल के मैदान में दिखाने का अवसर मिलता है अतः हम हिन्दु नवयुवकों से कहना चाहते हैं कि वे इन खेलों में पीछे न रहें। यह तो सत्य है कि आज हमारे हाथों में हथियार नहीं है,


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