अनेक मतों का प्रचलन हुआ। जिस बौद्व धर्म के अनुयायियों की संख्या इस विश्व में बहुत अधिक है, उसका जन्म भी भारत में हुआ और इसके मन्तव्यों पर वैदिक धर्म का प्रभाव प्रत्यक्षयता दिखाई पड़ता है। पारसी मत के प्रवत्र्तक महात्मा ज़र्दुश्त की मान्यताएं बहुत कुछ वैदिक धर्म पर आधारित हैं और इसकी प्रधान पुस्तक जे़ंदावस्ता में आर्य जाति के पुरातन सिद्वान्त ही प्रकारान्तर से लिपिबद्व किये गये हैं। ईसाइयत के पुराने नैतिक सिद्वांतों को भी प्राचीन वैदिक ग्रन्थों में बीज रूप में देखा जा सकता है।

डा. हेयर के अनुसार इस्लाम धर्म के नेता ने सीरिया की एक धर्मसभा में धर्मचर्चा की थी। कतिपय ईसाइयों ने बौद्व धर्म और ईसाई मत में समानता तो स्वीकार की है किन्तू वे बौद्व धर्म की उत्पत्ति ईसाई मत से मानते हैं। इस धारणा में सत्य नहीं है। भारत में बौद्व धर्म ईसाई मत के आविर्भाव से पहले उत्पन्न हो चुका था। अतः यह स्पष्ट है


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इस ग्रन्थ में क्या कुछ है, इसकी समीक्षा तो मराठा इतिहास के प्रामाणिक विद्वा नही करेंगे तथापि सर्वसाधारण को शिवाजी महाराज की वीरता, पराक्रम, धर्मप्रेम तथा देशभक्ति की एक मनोज झांकी मिलेगी, इसी विश्वास के साथ इस ग्रन्थ को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है।

भवानीलाल भारतीय

शान्तिनिकेतन,

3/5, शंकर कालोनी,

श्रीगंगानगर (राजस्थान)

ज्येष्ठ शु. एकादशी 2061 वि.


विज्ञप्ति

समय के परिवर्तन में जातियों का उत्थान अथवा पतन सहज स्वाभाविक होता है। किसी समय


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