और माल ’सोमदेव’ को दिया और उस इलाके का सूबेदार बना दिया। वह बड़ी चुतरता के साथ इलाके का प्रबन्ध करने लगा। मालगुजारी का प्रबन्ध देश की पुरानी रीति पर करना शुरू किया। उन जागीरों को जो हिन्दुओं के मन्दिरों और तीर्थ स्थानों की थी और जिन्हें मुसलमानों ने छीन लिया था, हिन्दुओं को वापस करा दिया। इनके सिवाय ’गोशाला’ और ’राइरी’ के पास किले बनवाने शुरू कर दिये। दो किले बने एक ’भर्दारी’ और दूसरा लंगाना’। मुल्ला अहमद से (जिसको आवाजी सोमदेव ने कैद किया था) शिवाजी बड़ी प्रतिष्ठा के साथ मिला और उसको कैद से छुड़ा दिया। वह वहां से छूट कर सीधा दरबार में जा पहुंचा और वहां उसने शिवाजी की शक्ति का वृत्तान्त सबको सुनाया, जिसे सुन कर आदिलशाह को बड़ी चिन्ता हुई। उसके मन में यह सन्देह था कि यह सब कार्यवाही शाहजी की साजिश से हो रही है, और चूंकि कर्नाटक में शाहजी बड़े जोर
वे आज के युग में होते तो बड़े से बड़े यूरोपीय विद्वानों और सेनापतियों को कुछ शिक्षा दे जाते। वे युद्व-विद्या के निपुण पण्डित थे। शत्रुओं को परास्त करने की तरकीबें उन्हें मालूम थी। वे परम धीर, वीर ओर गम्भीर थे। वीरता और पराक्रम में वे अद्वितीय थे। बादशाह औरंगजेब के एक मंत्री से जब किसी बात पर क्रोधित हुए तो उनमें आत्मविश्वास और निर्भिकता पराकष्ठा की थी। धर्म पर उनका विश्वास उस कोटि का था जिसके कारण औरंगजेब को उनसे मुंह की खानी पड़ी। वे वीरों के प्रशंसक थे तथा सदाचार