भी न खुला रहे। साथ ही यह भी धमकी दी कि यदि शिवाजी शीध्र ही अराजकता फैलाना बन्द न करेगा तो वह सूराख (छेद) भी बन्द कर दिया जायेगा और शाहजी को जिन्दा ही द़फन कर दिया जायेगा।
जब शिवाजी को पिता शाहजी के कैद होने का समाचार मिला तो बड़ी चिन्ता उपस्थित हुई। एक ओर तो पिता का जीवन संकट में और दूसरी और वर्षो की कड़ी मेहनत की कमाई कीर्ति और सम्पत्ति नष्ट होती थी और स्वतन्त्रता की आशा लता, जिसमें फल आने ही वाला था, सूखी जाती थी। शिवाजी इसी उधेड़ बुन में था कि बुद्विमती स्त्री ने समझााया कि क्षमा-प्रार्थना के अतिरिक्त स्वतन्त्रता से जो कार्यवाही की जायेगी वह शाहजी के लिए अधिक लाभदायक होगी। शिवाजी ने इस समय तक मुगलों के राज्य में हाथ नहीं डाला था इसलिए दूरदर्शिता से लाभ उठाने के लिए शाहजहंा से पत्र व्यवहार शुरू किया। जिसका फल यह हुआ कि शाहजहां ने आदिलशाह को शाहजी
पवित्र वंश में उत्पन्न हुए थे, जिसमें बड़े बड़े शूरवीर उत्पन्न हुए थे, जो वंश बहुत समय तक स्वतन्त्र रहा। जिसकी सन्तान अपनी जाति और देश के लिए अनेक बार लड़ी और जिसने बहुत सी कठिनाइयों को झेलते हुए भी मुसलमानों से सम्बंध नही किया। जो आज तक अपनी इस पवित्रता के कारण समस्त राजपूतों में शिरोमणि है। हमारा यह संकेत उदयपुर के राणावंश से है। मातृपक्ष की ओर से शिवाजी एक ऐसे ही प्राचीन राजवंश के हैं। मुसलमानों के आक्रमणों से पहले दक्षिण में यादव वंश के राजपूत