के अपराधों को क्षमा कर देने के लिए बाध्य किया और शिवाजी को पांच हजारी का पद देना स्वीकार किया। शाहजहां की कृपा और मुरार पन्त के प्रयत्न से शाहजी कैद से छूट गये और चार वर्ष तक दरबार में रहे।

शिवाजी की गिरफ्तारी का प्रयन्त

जब तक शिवाजी के पिता शाहजी दरबार में रहे शिवाजी ने अपनी कार्यवाही शिथिल रखी। बीजापुर के बादशाह ने कोई कार्यवाही शिवाजी के विरूद्व इस भय से नहीं की कि कहीं समस्त जीता हुआ राज्य दिल्ली के बादशाह को न सौंप दे तो भी बीजापुर का बादशाह शिवाजी की तरफ से

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बेसुध नहीं था। इस बात की गुप्त चेष्टा हो रही थी कि किसी प्रकार शिवाजी को कैद किया जाय। एक नीच प्रकृति का हिन्दू ’बाजी शामजी’ इस काम को पूरा करने के लिए तत्पर हुआ और जिस इलाके में शिवाजी रहता था वहां ताक में रहने लगा। शिवाजी को इसकी ख़बर लग गई। उसने स्वयं ’बाजी’


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राज करते थे जिनकी राजधानी देवगढ़ में भी जिसे कुछ समय मुहम्मद तुग़लक ने दौलताबाद के नाम से प्रसिद्व किया। शिवाजी के नाना यादवराव जी उसी पूज्य राजघराने के थे। यद्यपि समय के उलट फेर के कारण राज्य की बागडोर हाथ से निकल गई थी, फिर भी यह वंश उस इलाके में प्रतिष्ठित और उच्च गिना जाता था। कुछ इलाके उस समय भी इनके हाथ में थे और मुसलमानी राज्य में भी इस वंश के

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राजपूतों को अच्छे अच्छे पद दिये जाते थे।

मराठा वंश में यादवराव


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