और उसके साथियों पर आक्रमण करके जंगल में खदेड़ दिया। जावली के राजा चन्द्रराव ने इस विश्वासघाती को अपने राज्य में होकर जाने दिया था।
शिवाजी ने भरपूर कोशिश की कि राजा को इस बात पर राजी करें कि मुसलमानों के विरूद्व अपने देश को स्वतन्त्र करने के लिए तैयार हो परन्तु जावली के राजा चन्द्रराव ने शिवाजी की कोई बात न सुनी बल्कि विरूद्व में उस पार्टी की पदद की जो शिवाजी को कैद करने के लिए जा रही थी। शिवाजी के मित्रों को इस अनुचित कार्यवाही पर बड़ा क्रोध आया और वे बदला लेने की फिक्र में घूमने लगे। इस काम में उन लोगों ने कुटनीति से काम लेना उचित ठहराया। राघोबल्लाल अत्रे और ’सम्भाजी कावजी’ मित्र भाव से इसके राज्य में जा घुसे और समय पाकर चन्द्रराव का वध कर दिया। बाहर से उसके साथियों ने चारों तरफ से ’जावली’ को घेर लिया। बड़ी भारी लड़ाई के बाद मन्त्री हिम्मतराव भी मारा
का वंश सब से अधिक बली, पराक्रमी, प्रतिष्ठित और जागीरदार था। यादवराव के वंश का एक आदमी निजामशाही बादशाहत में दस हजार का जागीरदार था। उनकेक वंश में सदा देशमुखी चली आती थी। शिवाजी के दादा का नाम ’मालोजी’ भोंसले था जो देरोल ग्राम में रहा करता थां मालोजी का विवाह दक्षिण में एक प्रतिष्ठित वंष में हुआ था जो धनवान् और प्रतिष्ठित होने के अतिरिक्त अधिक प्राचीन भी था।
मालोजी भोंसले के साले को बनंगपाल निम्बालकर के नाम से पुकारते हैं। कोई कोई उसे जगपाल के नाम