कि ईसाई मत की उत्पत्ति बौद्व मत से हुई है। आर्यों के मान्य ग्रन्थ वेद संसार के प्राचीनतम धर्मग्रन्थ हैं। इसी तथ्य से यह सिद्व हो जाता है कि आर्य जाति संसार की प्राचीनतम जाति है। इस जाति में पाई जाने वाली विद्या, इसका धर्म तथा इसकी सभ्यता ही इसके प्राचीनतम होने के प्रमाण हैं।
जिस जाति ने गाणित और ज्योतिष विद्या का गूढ़तम
विज्ञप्ति 9
अध्ययन किया वह आज अधोगति को प्राप्त हो गई है। जिस जाति की नींव सभ्यता के उच्च स्वरूप पर रखी गई हो, उसके लिए आवश्यक है कि अन्य जातियों के ग्रन्थों का अध्ययन करने की अपेक्षा वह स्वयं के ग्रन्थों का ही परिशीलन करे। यह सब कुछ होने पर भी आर्य जाति का क्रमबद्व इतिहास नहीं है। इस विषय में कुछ लोगों का कहना है कि इतिहासलेखन की ओर हमारे पूर्वजों ने ध्यान नहीं दिया। कुछ अन्यों का ख्याल है कि हमारे अनके ग्रन्थ और उनसे भरे पुस्तकालय नष्ट कर दिये
उन्नतिशील रही कोई जाति जब पतन के गहरे गहृर में जा गिरती है, उस समय सिवाय अपने विगत वैभव को चिन्तन करने के, उसके पास उत्साहवर्धन का कोई साज सामान नहीं रहता। प्राचीन काल की वैभवशाली और सभ्य जातियों में आज कितनी शेष रही हैं ? मिस्त्र में पिरैमिडों का निर्माण करने वालों की वह पुरानी सभ्यता आज कराल काल के गाल में विलीन हो गई है। इन पुरातन जातियों में चीन का राष्ट्र आज भी जीवित है। रोम नष्ट हो गया, यूनानी मेक्सिको नष्ट हो गया किन्तू नष्ट होते होते उसने