सूबेदार के पास जाता है। वह बेचारा इस बेइमानी को न समझ सका। कुतुबशाह को इन बातों का तभी पता लगा जब शाहजादा मुहम्मद सुलतान उसके द्वार पर जा पहुंचा। विवश होकर कुतुबशाह ने अत्यन्त दीन भाव से सन्धि कर ली और एक करोड़ रूपया वार्षिक देना स्वीकार कर लिया। मीरजुमला दिल्ली दरबार में बुला लिया गया और इसे मन्त्री का पद दिया गया। इस बीच में मुहम्मद आदिलशाह ( बीजापुर का बादशाह) ता. 9 नवम्बर 1656 ई. को मर गया। दाराशिकोेह के द्वारा इस बादशाह का शाहजहां से परिचय हुआ था। इस कारण औरंगजेब इसको नुकसान पहुंचाना नहीं चाहता था। इसके मरते ही इसका बड़ा बेटा आदिलशाह तख़्त पर बैठ गया और इसने दिल्ली के बादशाह से किसी किस्म की बातचीत न की।

जब मुगलों को यह बात मालूम हुई तो वे आपे से बाहर हो गये और उन्होंने यह बहाना बनाया कि अली आदिलशाह


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में अनबन हो गई। इसके कुछ समय बाद मालोजी भोंसले को स्वप्न में किसी खजाने का हाल मालूम हुआ और वह बड़े धनपति हो गये। सम्पत्ति के मिल जाने पर इनके वंश की प्रतिष्ठा और बढ़ गई और दरबार से भी 5000 का अधिकार मिल गया। अहमदनगर के दरबारियों ने बीच में पड़ कर मालोजी और यादवराज की फिर मित्रता करा दी और अन्त में शाह जी और जीजीबाई का विवाह हो गया।

कहते हैं कि मालोजी भोंसले भवानीदेवी के परमभक्त थे। एक बार देवी ने स्वप्न में मालोजी को दर्शन दिया


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