उस महती शक्ति के विरूद्व भाग्य की परीक्षा करने लगे जो 100 वर्ष पूर्व से भारत की अधिपति बनी चली आती थी, जिसकी गद्दी पर आज औरंगजेब जैसा नृशंस और कपटी मनुष्य विराजमान था। यद्यपि शिवाजी राज-प्रबन्ध करने लगे थे परन्तू मन में निश्चय कर लिया कि जब तक सामना करने की पूर्ण सामग्री न हो जाये तब तक सामना न करना ही ठीक होगा और तब तक चापलूसी की बातों से ही औरंगजेब को भुलावा देते रहे।

ऊपर लिखा जा चुका है कि जब शाहजी दरबार बीजापुर में कैद किये गये थे तो शिवाजी ने शाहजहां से अपील की थी और शाहजहां ने उनको पांच हजारी का पारितोषिक दिया था। परन्तू शिवाजी ने उसे स्वीकार करने के स्थान पर कुछ प्रान्तों के विषय में अपनी देखमुखी और चैथ के अधिकार पेश किये थे। अन्त में शाहजहां ने यह प्रतिज्ञा की थी कि जब शिवाजी पांच हजारी पुरस्कार को स्वीकार करके दरबार में आ जायेंगे


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सन् 1620 ई. की लड़ाई में शाह जी ने खूब वीरता दिखाई और कीर्ति के अधिकारी हुए। इस लड़ाई में उनके श्वसुर यादवराव भी उपस्थित थे। यद्यपि ’मलिक’ हार गया परन्तु समस्त इतिहास लेखक मानते हैं कि इस हार के उत्तदायी मरहठे न थे। इस लड़ाई में शाहजी भोंसले और यादवराव ने जो कार्य कर दिखाया उससे मुगलों की सेना में

छत्रपति शिवाजी 35

मरहठों की पूरी धाक जम गई और मुगल सेनापति इस प्रबन्ध में लग गया कि येन केन प्रकारेण मरहठों को अपने में मिलावें। कुछ


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