तो और अधिकारों पर भी विचार किया जायेगा। शिवाजी ने अब फिर इस विषय में औरंगजेब के साथ बातचीत की और बीजापुर के बादशाह आदिलशाह के कुप्रबन्ध की नींव पर ’कोंकण’ प्रान्त पर स्वत्व

छत्रपति शिवाजी 55

ज्माने की आज्ञा चाही तथा अपने पुराने अनुचर को पेश किया और बारी बारी से ’रघुनाथ’ और ’कृष्णजी भास्कर’ नामक वकीलों को मुगल दरबार में भेजा।

औरंगजेब इस समय राजपुतों से लड़ रहा था। उसने भी अपना अहोभाग्य समझा कि शिवाजी की तरफ से चिन्ता दूर हो। इसके सिवाय उसने यह सोचा कि यदि शिवाजी और आदिलशाह परस्पर लड़ते रहेंगे तो दोनों में से कोई भी मुगल साम्राज्य पर धावा न कर सकेंगे और परस्पर एक दूसरे की शक्ति क्षीण कर देंगे। फलस्वरूप शिवाजी को, कोंकण प्रान्त पर अधिकार जमाने की आज्ञा औरंगजेब ने दे दी। उसके वास्तविक अधिकारों के विषय में बाजी ’सोनदेव’ को दरबार


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दिनों बाद यादवराव, मलिक अम्बर से बिगड़कर मुगल सेना से मिल गये जिसके फलस्वरूप 15 सवार उनके अधिकार में दिये गये। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि मुगल सम्राट् के प्रतिनिधियों ने जो दक्षिण में लड़ रहे थे सम्राट् की आज्ञानुसार एक मरहठे सरदार की कितनी प्रतिष्ठा की। जो सम्बन्धी उनके साथ आये थे उनको भी बड़े बड़े पद और अधिकार दिये गये, परन्तु शाहजी भोंसले अपने श्वसुर के साथ नहीं आया थां वह अपनी मरहठा सेना लिऐ अपने स्थान पर डटा रहा। सन् 1667 ई.


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