नियुक्त किया गया। शिवाजी के मन्त्रियों में सब से उच्च अधिकार शामरावजी पन्त का था। ’कोंकण’ की विजय प्राप्ति के लिए एक बहुत बड़ी सेना एकत्रित करके उसको प्रबन्धकर्ता नियत किया गया, परन्तु
56 छत्रपति शिवाजी
परीक्षा से यह निश्चय हो गया िकवह सेना का नायक होने की योग्यता नहीं रखता है। फलस्वरूप उस नायक को बीजापुर की सेना के सम्मुख हारना पड़ा जिससे शिवाजी को अत्यन्त क्लेश हुआ। यह पहली हार थी यद्यपि वह स्वयं उस पराजय का उत्तरदाता न था। अतएव शामरावजी़ पन्त को पीछे बुला लिया गया और नायक पद से पृथक् कर दिया गया और उसके स्थान पर ’रघुनाथ पन्त’ यद्यपि स्वयं रणभूमि से पीछे नहीं हटा परन्तु अपने विरोधी की भी नहीं हटा सका। अन्त को वर्षा ऋतु के आरम्भ होने से दोनों सेनाएं संग्राम-भूमि से पीछे हट गई। इस समय एक और बलवान् शत्रु शिवाजी के सामने आया।
अध्याय 5
मदद दी, खूब डट कर लड़ाई हुई। फलस्वरूप मुसलमानी सेना को अधिक हानि उठानी पड़ी और विफल मनोरथ ही सेना वापस लौटी। इस पराजय से शाहजहां को इतना क्रोध आया कि स्वयम् एक बड़ी सेना लेकर दक्षिण की ओर चला। अन्त में डट कर युद्व हुआ परन्तु खांजहां हार कर भाग गया। शाहजी भोंसले ने देखा कि जिसके लिए हम मुगलवंश से युद्व कर रहे थे वह भाग निकला तो उन्होंने भी सन्धि कर ली। बादशाह शाहजहां ने शाहजी भोंसले की बड़ी प्रतिष्ठा की और छः हजार का अधिकार देकर पांच हजार सवार का अफसर बना दिया और पहली सम्पत्ति के अतिरिक्त