अफजल खां की घटना
बीजापुर के शासक ने इस समय अनुमान लगाया कि शिवाजी को अधीन करना अत्यन्त आवश्यक है अन्यथा सम्पूर्ण देश निकल जाने का सन्देह है। इस लड़ाई के लिए बीजापुर दरबार ने प्रबन्ध आरम्भ कर दिया। अफजल खां ने (जो बीजापुर दरबार का एक पदाधिकारी था) इस सेना की सिपहसालारी स्वाकार की और चलते समय भरे दरबार में बड़ो अंहकार से यह प्रतिज्ञा की कि मैं बहुत शीध्र इस तुच्छ द्रोही को नंगे पांव दरबार में उपस्थित करूंगा अन्यथा उसका सिर काट लाऊंगा। शिवाजी को जब यह समाचार मिले तो उन्होंने प्रतापगढ़ के दुर्ग में सामना करने की तैयारी की। अफजल खां ने 5000 सवार तथा 7000 पैदल सेना, तोपखाना व अन्य सांग्रामिक सामग्री साथ लेकर चढ़ाई कर दी।
प्रतापगढ़ किला उन किलों में से है जिन्हें शिवाजी ने स्वयं बनवाया था। प्रतापगढ़ की स्थानिक अवस्था शिवाजी की बुद्विमत्ता तथा विचारशीलता
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और बहुत सी सम्पत्ति दी।
इतना होने पर भी शाहजी भोंसले पूर्ववत् निजामशाही राज्य का शुभचिन्तक बना रहा परन्तु जब निजामशाही राज्य के प्रधान फतेहखां ने अपने बादशाह का वध करके शाहजहां से सन्धि करने का विचार किया किन्तू सन्धि के नियमों पर स्थिर न रहा तो शाह जी भोंसले निजामशाही राज्य छोड़कर बीजापुर के दरबार में चला गया। उन दिनों शाहजी भोंसले का दक्षिण में बड़ा जोर था। आदिलशाह (बीजापुर) बादशाह से शाहजी का मिल जाना बहुत अच्छा हुआ। इस समय